ग़ज़ल
हक वफ़ा का जो हम जताने लगे
हक वफ़ा का जो हम जताने लगेआप कुछ कह के मुस्कुराने लगे
हम को जीना पड़ेगा फुरक़त मेंवो अगर हिम्मत आज़माने लगे
डर है मेरी जुबान न खुल जायेअब वो बातें बहुत बनाने लगे
जान बचती नज़र नहीं आतीगैर उल्फत बहुत जताने लगे
तुम को करना पड़ेगा उज्र-ए-जफाहम अगर दर्द-ए-दिल सुनाने लगे
बहुत मुश्किल है शेवा-ए-तस्लीमहम भी आखिर को जी चुराने लगे
वक़्त-ए-रुखसत था सख्त “हाली” परहम भी बैठे थे जब वो जाने लगे
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