ग़ज़ल
मिली हवाओं में उड़ने की
मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारोके मैं ज़मीन के रिश्तों से कट गया यारो
वो बेख़याल मुसाफ़िर मैं रास्ता यारोकहाँ था बस में मेरे उस को रोकना यारो
मेरे क़लम पे ज़माने की गर्द ऐसी थीके अपने बारे में कुछ भी न लिख सका यारो
तमाम शहर ही जिस की तलाश में गुम थामैं उस के घर का पता किस से पूछता यारो
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