ग़ज़ल
तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते
तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आतेइसीलिए तो तुम्हें हम नज़र नहीं आते
मुहब्बतों के दिनों की यही ख़राबी हैये रूठ जाएँ तो फिर लौटकर नहीं आते
जिन्हें सलीका है तहज़ीब-ए-ग़म समझने काउन्हीं के रोने में आँसू नज़र नहीं आते
ख़ुशी की आँख में आँसू की भी जगह रखनाबुरे ज़माने कभी पूछकर नहीं आते
बिसाते-इश्क पे बढ़ना किसे नहीं आतायह और बात कि बचने के घर नहीं आते
वसीम जहन बनाते हैं तो वही अख़बारजो लेके एक भी अच्छी ख़बर नहीं आते
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