ग़ज़ल
अजहूँ चेति अचेत
अजहूँ चेति अचेतसबै दिन गए विषय के हेत।तीनौं पन ऐसैं हीं खोए, केश भए सिर सेत॥आँखिनि अंध, स्त्रवन नहिं सुनियत, थाके चरन समेत।गंगा-जल तजि पियत कूप-जल, हरि-तजि पूजत प्रेत॥मन-बच-क्रम जौ भजै स्याम कौं, चारि पदारथ देत।ऐसौ प्रभू छाँडि़ क्यौं भटकै, अजहूँ चेति अचेत॥राम नाम बिनु क्यौं छूटौगे, चंद गहैं ज्यौं केत।सूरदास कछु खरच न लागत, राम नाम मुख लेत॥
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh