ग़ज़ल

उधो मनकी मनमें रही

सूरदास · सब कलाम देखें
उधो मनकी मनमें रही ॥ध्रु०॥गोकुलते जब मथुरा पधारे । कुंजन आग देही ॥१॥पतित अक्रूर कहासे आये । दुखमें दाग देही ॥२॥तन तालाभरना रही उधो । जल बल भस्म भई ॥३॥हमरी आख्या भर भर आवे । उलटी गंगा बही ॥४॥सूरदास प्रभु तुमारे मिलन । जो कछु भई सो भई ॥५॥
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh