ग़ज़ल
उधो मनकी मनमें रही
उधो मनकी मनमें रही ॥ध्रु०॥गोकुलते जब मथुरा पधारे । कुंजन आग देही ॥१॥पतित अक्रूर कहासे आये । दुखमें दाग देही ॥२॥तन तालाभरना रही उधो । जल बल भस्म भई ॥३॥हमरी आख्या भर भर आवे । उलटी गंगा बही ॥४॥सूरदास प्रभु तुमारे मिलन । जो कछु भई सो भई ॥५॥
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