ग़ज़ल

अब मैं जानी देह बुढ़ानी

सूरदास · सब कलाम देखें
अब मैं जानी देह बुढ़ानी ।सीस, पाउँ, कर कह्यौ न मानत, तन की दसा सिरानी।आन कहत, आनै कहि आवत, नैन-नाक बहै पानी।मिटि गई चमक-दमक अँग-अँग की, मति अरु दृष्टि हिरानी।नाहिं रही कछु सुधि तन-मन की, भई जु बात बिरानी।सूरदास अब होत बिगूचनि, भजि लै सारँगपानी
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