ग़ज़ल

अंखियां हरि-दरसन की भूखी

सूरदास · सब कलाम देखें
अंखियां हरि-दरसन की भूखी।कैसे रहैं रूप-रस रांची ये बतियां सुनि रूखी॥अवधि गनत इकटक मग जोवत तब ये तौ नहिं झूखी।अब इन जोग संदेसनि ऊधो, अति अकुलानी दूखी॥बारक वह मुख फेरि दिखावहुदुहि पय पिवत पतूखी।सूर, जोग जनि नाव चलावहु ये सरिता हैं सूखी॥
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