ग़ज़ल

आनि सँजोग परै

सूरदास · सब कलाम देखें
आनि सँजोग परैभावी काहू सौं न टरै।कहँ वह राहु, कहाँ वे रबि-ससि, आनि सँजोग परै॥मुनि वसिष्ट पंडित अति ज्ञानी, रचि-पचि लगन धरै।तात-मरन, सिय हरन, राम बन बपु धरि बिपति भरै॥रावन जीति कोटि तैंतीसा, त्रिभुवन-राज करै।
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