ग़ज़ल
अपन जान मैं बहुत करी
आछो गात अकारथ गार्यो।करी न प्रीति कमललोचन सों, जनम जनम ज्यों हार्यो॥निसदिन विषय बिलासिन बिलसत फूटि गईं तुअ चार्यो।अब लाग्यो पछितान पाय दुख दीन दई कौ मार्यो॥कामी कृपन कुचील कुदरसन, को न कृपा करि तार्यो।तातें कहत दयालु देव पुनि, काहै सूर बिसार्यो॥
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