ग़ज़ल

अंखियां हरि–दरसन की प्यासी

सूरदास · सब कलाम देखें
अंखियां हरि–दरसन की प्यासी।देख्यौ चाहति कमलनैन कौ¸ निसि–दिन रहति उदासी।।आए ऊधै फिरि गए आंगन¸ डारि गए गर फांसी।केसरि तिलक मोतिन की माला¸ वृन्दावन के बासी।।काहू के मन को कोउ न जानत¸ लोगन के मन हांसी।सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस कौ¸ करवत लैहौं कासी।।
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