ग़ज़ल

ज़हानतों को कहाँ कर्ब से फ़रार मिला

निदा फ़ाज़ली · सब कलाम देखें
ज़हानतों को कहाँ कर्ब से फ़रार मिलाजिसे निगाह मिली उसको इंतज़ार मिला
वो कोई राह का पत्थर हो या हसीं मंज़रजहाँ से रास्ता ठहरा वहीं मज़ार मिला
कोई पुकार रहा था खुली फ़िज़ाओं सेनज़र उठाई तो चारो तरफ़ हिसार मिला
हर एक साँस न जाने थी जुस्तजू किसकीहर एक दयार मुसाफ़िर को बेदयार मिला
ये शहर है कि नुमाइश लगी हुई है कोईजो आदमी भी मिला बनके इश्तहार मिला
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