ग़ज़ल
जहाँ न तेरी महक हो उधर न जाऊँ मैं
जहाँ न तेरी महक हो उधर न जाऊँ मैंमेरी सरिश्त सफ़र है गुज़र न जाऊँ मैं
मेरे बदन में खुले जंगलों की मिट्टी हैमुझे सम्भाल के रखना बिखर न जाऊँ मैं
मेरे मिज़ाज में बे-मानी उलझनें हैं बहुतमुझे उधर से बुलाना जिधर न जाऊँ मैं
कहीं पुकार न ले गहरी वादियों का सबूतकिसी मक़ाम पे आकर ठहर न जाऊँ मैं
न जाने कौन से लम्हे की बद-दुआ है येक़रीब घर के रहूँ और घर न जाऊँ मैं
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