ग़ज़ल

दीवार-ओ-दर से उतर के परछाइयाँ बोलती हैं

निदा फ़ाज़ली · सब कलाम देखें
दीवार-ओ-दर से उतर के परछाइयाँ बोलती हैंकोई नहीं बोलता जब तनहाइयाँ बोलती हैं
परदेस के रास्ते में लुटते कहाँ हैं मुसाफ़िरहर पेड़ कहता है क़िस्सा पुरवाईयाँ बोलती हैं
मौसम कहाँ मानता है तहज़ीब की बन्दिशों कोजिस्मों से बाहर निकल के अंगड़ाइयाँ बोलती हैं
सुन ने की मोहलत मिले तो आवाज़ है पतझरों मेंउजड़ी हुई बस्तियों में आबादियाँ बोलती हैं
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh