ग़ज़ल
जंग
सरहदों पर फ़तह का ऐलान हो जाने के बादजंग!बे-घर बे-सहारासर्द ख़ामोशी की आँधी में बिखर केज़र्रा-ज़र्रा फैलती हैतेलघीआटाखनकती चूड़ियों का रूप भर केबस्ती-बस्ती डोलती है
दिन-दहाड़ेहर गली-कूचे में घुसकरबंद दरवाजों की साँकल खोलती हैमुद्दतों तकजंग!घर-घर बोलती हैसरहदों पर फ़तह का ऐलान हो जाने के बाद
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