ग़ज़ल

दिन सलीक़े से उगा, रात ठिकाने से रही

निदा फ़ाज़ली · सब कलाम देखें
दिन सलीक़े से उगा रात ठिकाने से रहीदोस्ती अपनी भी कुछ रोज़ ज़माने से रही
चंद लम्हों को ही बनती हैं मुसव्विर आँखेंज़िन्दगी रोज़ तो तस्वीर बनाने से रही
इस अँधेरे में तो ठोकर ही उजाला देगीरात जंगल में कोई शम्मा जलाने से रही
फ़ासला चाँद बना देता है हर पत्थर कोदूर की रौशनी नज़दीक तो आने से रही
शहर में सब को कहाँ मिलती है रोने की फ़ुरसतअपनी इज़्ज़त भी यहाँ हँसने-हँसाने से रही
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