ग़ज़ल
इक़रारनामा
(शीला किणी के लिए)
ये सच हैजब तुम्हारे जिस्म के कपड़ेभरी महफ़िल में छीने जा रहे थेउस तमाशे का तमाशाई था मैं भीऔर मैं चुप था
ये सच हैजब तुम्हारी बेगुनाही कोहमेशा की तरह सूली पे टांगा जा रहा थाउस अंधेरे मेंतुम्हारी बेजुबानी ने पुकारा था मुझे भीऔर मैं चुप था
ये सच हैजब सुलगती रेत पर तुमसर बरहनाअपने बेटे भाइयों को तनहा बैठी रो रही थींमैं किसी महफ़ूज गोशे मेंतुम्हारी बेबसी का मर्सिया थाऔर मैं चुप था
ये सच हैआज भी जबशेर चीतों से भरी जंगल से टकरातीतुम्हारी चीख़ती साँसेंमुझे आवाज़ देती हैं
मेरी इज्ज़त, मेरी शोहरतमेरी आराम की आदतमेरे घर बार की ज़ीनतमेरी चाहत, मेरी वहशतमेरे बढ़ते हुए क़दमों को बढ़कर रोक लेती है
मैं मुजरिम थामैं मुजरिम हूँमेरी ख़ामोशी मेरे जुर्म की जिंदा शहादत हैमैं उनके साथ था
जो जुल्म को ईजाद करते हैंमैं उनके साथ हूँजो हँसती गाती बस्तियाँबर्बाद करते हैं
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