ग़ज़ल
सूर आयौ माथे पर, छाया आई पाँइन तर
सूर आयौ माथे पर, छाया आई पाइँन तर,उतर ढरे पथिक डगर देखि छाँह गहरी ।सोए सुकुमार लोग जोरि कै किंवार द्वार,पवन सीतल घोख मोख भवन भरत गहरी ॥धंधी जन धंध छाँड़ि, जब तपत धूप डरन,पसु-पंछी जीव-जंतु छिपत तरुन सहरी ।नंददास प्रभु ऐसे में गवन न कीजै कहुँ,माह की आधी रात जैसी ये जेठ की दुपहरी ॥
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