ग़ज़ल
ऊधव के उपदेश सुनो ब्रज नागरी
ऊधव को उपदेश सुनो ब्रज-नागरीरूप सील लावण्य सबै गुन आगरीप्रेम-धुजा रस रुपिनी, उपजावत सुख पुंजसुन्दरस्याम विलासिनी, नववृन्दावन कुंजसुनो ब्रज-नागरी
कहन स्याम संदेस एक मैं तुम पे आयौकहन समै संकेत कहूँ अवसर नहिं पायौसोचत हीं मन में रह्यों,कब पाऊँ इक ठाऊँकहि संदेस नंदलाल को, बहुरि मधुपुरी जाऊँसुनो ब्रज-नागरी
ताहि छिन इक भँवर कहूँते तहँ आयौब्रजवनितन के पुंज माहि,गुंजत छबि छायौचढ्यो चहत पग पगनि पर,अरुन कमल दल जानिमनु मधुकर उधो भयो ,प्रथमहिं प्रगट्यो आनिमधुप को भेष धरि
कोऊ कहे रे मधुप भेष उनही कौ धारयौस्याम पीत गुंजार बैन किंकिनि झनकारयौवा पुर गोरस चोरिकै, फिरि आयो यहि देसइनको जनि मानहुं कोऊ, कपटी इनको भेसचोरि जनि जय कछु
कोऊ कहे रे मधुप कहा तू रस को जानेबहुत कुसुम पै बैठ सबै आपन सम मानेआपन सम हमकों कियो चाहत है मति मंददुबिध ज्ञान उपजायके, दुखित प्रेम आनन्दकपट के छंद सों
कोऊ कहे रे मधुप प्रेम षट्पद पसु देख्योअबलौं यहि ब्रजदेस माहि कोऊ नहि विसेख्योद्वै सिंग आनन ऊपर ते, कारो पिरो गातखल अमृत सम मानहीं अमृत देखि डरातबादि यह रसिकता
कोऊ कहे रे मधुप ग्यान उलटो ले आयौमुक्त परे जे फेरि तिन्हें पुनि करम बतायोवेड उपनिषद सर जे मोहन गुन गहि लेततिनके आतम सुद्ध करि,फिरि फिरि संथा देतजोग चटसार मैं
कोऊ कहे रे मधुप तुम्हें लज्जा नहि आवेसखा तुम्हारे स्याम कूबरी नाथ कहावेयह नीची पदवी हुती गोपीनाथ कहायअब जदुकुल पावन भयौ,दासी जूठन खायमरत कह बोल को
धन्य धन्य जे लोग भजत हरि को जो ऐसेअरु जो पारस प्रेम बिना पावत कोउ कैसेमेरे या लघु ग्यान को,उर मद कह्यो उपाधअब जान्यौ ब्रज प्रेम को,लहत न आधौ आधवृथा स्रम करि थक
करुनामई रसिकता है तुम्हरी सब झूठीजब ही लौं नहि लखौ तबहि लौ बांधी मूठीमैं जान्यौ ब्रज जाय कै, तुम्हरो निर्दय रूपजो तुम्हरे अवलम्ब हीं, वाकौ मेलौ कूपकौन यह धर्म है
पुनि पुनि कहैं जु जाय चलो वृन्दावन रहियेप्रेम पुंज कौ प्रेम जाय गोपिन संग लहियेऔर काम सब छाँरि कै,उन लोगन सुख देहुनातरु टूट्यो जात है अब हि नेह सनेहूकरौगे तो कहा
सुनत सखा के बैन नैन भरि आये दोउविवस प्रेम आवेस रही नाहीं सुधि कोऊरोम रोम प्रति गोपिका,ह्वै रहि सांवर गातकल्प तरोरुह सांवरो ब्रजवनिता भईं पातउलहि अंग अंग तें
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