ग़ज़ल
इतना हुस्न पे हुज़ूर न ग़ुरूर कीजिए
इतना हुस्न पे हुज़ूर ना ग़ुरूर कीजिएदिल के मारों का ख़्याल कुछ ज़रूर कीजिए
यूँ न फेरिए नज़र मुड़ के देखिए इधरकहिए जो भी चाहिए इतनी अर्ज़ है मगरजो हैं आपके उन्हें यूँ न दूर कीजिएइतना हुस्न पे हुज़ूर ...
रोको ज़ुल्फ़ को यहीं क़ाबू दिल पे अब नहींये दीवाना आपका ज़ुल्फ़ें छू न ले कहींयूँ न रूठ के हमें मजबूर कीजिएइतना हुस्न पे हुज़ूर ...
यह तो जानते हैं हम गुस्सा तुम नहीं सनमजाते-जाते आपके अब तो रुक गए क़दमकहिए है ना दिल की बात, मंज़ूर कीजिएइतना हुस्न पे हुज़ूर ...
(फ़िल्म -- ’मोहब्बत इसको कहते हैं’ - 1965)
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