ग़ज़ल

ओ मेरे सोना रे, सोना रे, सोना रे

मजरूह सुल्तानपुरी · सब कलाम देखें
ओ मेरे सोना रे! सोना रे! सोना रे !दे दूँगी जान जुदा मत होना रेमैने तुझे ज़रा देर में जानाहुआ कुसूर ख़फ़ा मत होना रेओ मेरे सोना रे! सोना रे! सोना रे!
ओ मेरी बाँहों से निकलकेतू अगर मेरे रस्ते से हट जाएगातो लहराके, हो बलखाकेमेरा साया तेरे तन से लिपट जाएगातुम छुड़ाओ लाख दामनछोड़ते हैं कब ये अरमांकि मैं भी साथ रहूँगी रहोगे जहाँओ मेरे ...
ओ मियाँ हमसे न छिपाओवो बनावट कि सारी अदाएँ लिएकि तुम इसपे हो इतरातेकि मैं पीछे हूँ सौ इल्तिज़ाएँ लिएजी मैं ख़ुश हूँ मेरे सोनाझूठ है क्या, सच कहो नाकि मैं भी साथ रहूँगी रहोगे जहाँओ मेरे ...
ओ फिर हमसे न उलझनानहीं लट और उलझन में पड़ जाएगीओ पछताओगी कुछ ऐसेकि ये सुर्ख़ी लबों की उतर जाएगीये सज़ा तुम भूल न जानाप्यार को ठोकर मत लगानाकि चला जाऊँगा फिर मैं न जाने कहाँओ मेरे ...
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