ग़ज़ल

इक दिन बिक जाएगा, माटी के मोल

मजरूह सुल्तानपुरी · सब कलाम देखें
इक दिन बिक जाएगा, माटी के मोलजग में रह जाएंगे, प्यारे तेरे बोलदूजे के होंठों को, देकर अपने गीतकोई निशानी छोड़, फिर दुनिया से डोलइक दिन बिक जायेगा ...
ला ला ललल्लल्ला
(अनहोनी पग में काँटें लाख बिछाएहोनी तो फिर भी बिछड़ा यार मिलाए ) \- (२)ये बिरहा ये दूरी, दो पल की मजबूरीफिर कोई दिलवाला काहे को घबराये, तरम्पम,धारा, तो बहती है, बहके रहती हैबहती धारा बन जा, फिर दुनिया से डोलएक दिन ...
(परदे के पीछे बैठी साँवली गोरीथाम के तेरे मेरे मन की डोरी ) \- (२)ये डोरी ना छूटे, ये बन्धन ना टूटेभोर होने वाली है अब रैना है थोड़ी, तरम्पम,सर को झुकाए तू, बैठा क्या है यारगोरी से नैना जोड़, फिर दुनिया से डोलएक दिन ...
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