ग़ज़ल

कहीं करती होगी, वो मेरा, इंतज़ार

मजरूह सुल्तानपुरी · सब कलाम देखें
कहीं करती होगी, वो मेरा, इंतज़ारजिसकी तमन्ना में, फिरता हूँ बेक़रार
दूर ज़ुल्फ़ों कि छाओं से,कहता हूँ मैं हवाओं सेउसी बुत कि अदाओं के, अफ़साने हज़ारवो जो बाहों में मचल जाती,हसरत ही निकल जाती,मेरी दुनिया बदल जाती, मिल जाता क़रारकहीं करती होगी ...
कहीं बैठी होगी राहों मेंगुम अपनी ही बाहों मेंलिये खोयी सी निगाहों में, खोया खोया स प्यारसाया रुकी होगी आँचल कीचुप होगी धुन पायल कीहोगी पलकों में काजल की, खोयी खोयी बहारकहीं करती होगी ...
अरमान है कोई पास आये,इन हाथों में वो हाथ आये,फिर ख़्वाबों की घटा छाये, बरसाये खुमारउन्हीं बीती दिन रातों पे,मतवाली मुलक़ातों पे,उल्फ़त भरी बातों पे, हम होते निसार
कहीं करती होगी, वो मेरा, इंतज़ारजिसकी तमन्ना में, फिरता हूँ बेक़रार
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