ग़ज़ल
इन बहारों में अकेले न फिरो
इन बहारों में अकेले न फिरोराह में काली घटा रोक न लेमुझ को ये काली घटा रोकेगी क्याये तो ख़ुद है मेरी ज़ुल्फ़ों के तले
ये फ़िज़ाएँ ये नज़ारे शाम केसारे आशिक़ हैं तुम्हारे नाम केफूल कहती है ओ हो हो होफूल कहती है तुम्हें बाद-ए-सबा, तुम्हें बाद-ए-सबादेखना बाद-ए-सबा रोक न लेइन बहारों में अकेले ...
मेरे क़दमों से बहारों की गलीमेरा चेहरा देखती है हर कलीजानते हैं सब ओ हो हो होजानते हैं सब मुझे गुलज़ार में, मुझे गुलज़ार मेंरंग सब को मेरे होंठों से मिलेइन बहारों में अकेले ...
(फ़िल्म -- ’ममता’ - 1966)
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