ग़ज़ल
चला जाता हूँ किसी की घुन में
चला जाता हूँ, किसी की धुन मेंधड़कते दिल के, तराने लियेमिलन की मस्ती, भरी आँखों मेंहज़ारों सपने, सुहाने लिये, चला जाता हूँ...
ये मस्ती के, नज़ारें हैं, तो ऐसे मेंसम्भलना कैसा मेरी क़समतू लहराती, डगरिया हो, तो फिर क्यूँ नाचलूँ मैं बहका बहका रेमेरे जीवन में, ये शाम आई हैमुहब्बत वाले, ज़माने लिये, चला जाता हूँ...
वो आलम भी, अजब होगा, वो जब मेरेकरीब आएगी मेरी क़समकभी बइयाँ छुड़ा लेगी, कभी हँसकेगले से लग जाएगी हायमेरी बाहों में, मचल जाएगीवो सच्चे झूठे बहाने लिये, चला जाता हूँ...
बहारों में, नज़ारों में, नज़र डालूँतो ऐसा लागे मेरी क़समवो नैनों में, भरे काजल, घूँघट खोलेखडी हैं मेरे आगे रेशरम से बोझल झुकी पलकों मेंजवाँ रातों के फ़साने लिये, चला जाता हूँ...
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