ग़ज़ल

आसमाँ के नीचे, हम आज अपने पीछे

मजरूह सुल्तानपुरी · सब कलाम देखें
आसमाँ के नीचे, हम आज अपने पीछेप्यार का जहाँ, बसा के चलेकदम के निशाँ, बना के चले, आसमाँ ...
तुम चले तो फूल जैसे आँचल के रँग सेसज गई राहें, सज गई राहेंपास आओ मै पहना दूँ चाहत का हार येखुली खुली बाहें, खुली खुली बाहेंजिस का हो आँचल खुद ही चमनकहिये, वो क्यूँ, हार बाहों के डाले, आसमाँ ...
बोलती हैं आज आँखें कुछ भी न आज तुमकहने दो हमको, कहने दो हमकोबेखुदी बढ़ती चली है अब तो ख़ामोश हीरहने दो हमको, रहने दो हमकोइक बार एक बार, मेरे लियेकह दो, खनकें, लाल होंठों के प्याले, आसमाँ ...
साथ मेरे चल के देखो आई हैं दूर सेअब की बहारें, अब की बहारेंहर गली हर मोड़ पे वो दोनों के नाम सेहमको पुकारे, तुमको पुकारेकह दो बहारों से, आए न इधरउन तक, उठकर, हम नहीं जाने वाले, आसमाँ ...
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