ग़ज़ल

दीप मेरे जल अकम्पित

महादेवी वर्मा · सब कलाम देखें
दीप मेरे जल अकम्पित,घुल अचंचल!सिन्धु का उच्छवास घन है,तड़ित, तम का विकल मन है,भीति क्या नभ है व्यथा काआँसुओं से सिक्त अंचल!स्वर-प्रकम्पित कर दिशायें,मीड़, सब भू की शिरायें,गा रहे आंधी-प्रलयतेरे लिये ही आज मंगल
मोह क्या निशि के वरों का,शलभ के झुलसे परों कासाथ अक्षय ज्वाल कातू ले चला अनमोल सम्बल!
पथ न भूले, एक पग भी,घर न खोये, लघु विहग भी,स्निग्ध लौ की तूलिका सेआँक सबकी छाँह उज्ज्वल
हो लिये सब साथ अपने,मृदुल आहटहीन सपने,तू इन्हें पाथेय बिन, चिरप्यास के मरु में न खो, चल!
धूम में अब बोलना क्या,क्षार में अब तोलना क्या!प्रात हंस रोकर गिनेगा,स्वर्ण कितने हो चुके पल!दीप रे तू गल अकम्पित,चल अंचल!
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