ग़ज़ल

नीर भरी दुख की बदली

महादेवी वर्मा · सब कलाम देखें
मैं नीर भरी दु:ख की बदली!
स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,क्रन्दन में आहत विश्व हंसा,नयनों में दीपक से जलते,पलकों में निर्झरिणी मचली!
मेरा पग-पग संगीत भरा,श्वासों में स्वप्न पराग झरा,नभ के नव रंग बुनते दुकूल,छाया में मलय बयार पली,
मैं क्षितिज भॄकुटि पर घिर धूमिल,चिंता का भार बनी अविरल,रज-कण पर जल-कण हो बरसी,नव जीवन अंकुर बन निकली!
पथ को न मलिन करता आना,पद चिन्ह न दे जाता जाना,सुधि मेरे आगम की जग में,सुख की सिहरन बन अंत खिली!
विस्तृत नभ का कोई कोना,मेरा न कभी अपना होना,
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh