ग़ज़ल

अश्रु यह पानी नहीं है

महादेवी वर्मा · सब कलाम देखें
अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है!
यह न समझो देव पूजा के सजीले उपकरण ये,यह न मानो अमरता से माँगने आए शरण ये,स्वाति को खोजा नहीं है औ' न सीपी को पुकारा,मेघ से माँगा न जल, इनको न भाया सिंधु खारा!शुभ्र मानस से छलक आए तरल ये ज्वाल मोती,प्राण की निधियाँ अमोलक बेचने का धन नहीं है।
अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है!
नमन सागर को नमन विषपान की उज्ज्वल कथा कोदेव-दानव पर नहीं समझे कभी मानव प्रथा को,कब कहा इसने कि इसका गरल कोई अन्य पी ले,अन्य का विष माँग कहता हे स्वजन तू और जी ले।यह स्वयं जलता रहा देने अथक आलोक सब को
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh