ग़ज़ल

पूछता क्यों शेष कितनी रात?

महादेवी वर्मा · सब कलाम देखें
पूछता क्यों शेष कितनी रात?छू नखों की क्रांति चिर संकेत पर जिनके जला तूस्निग्ध सुधि जिनकी लिये कज्जल-दिशा में हँस चला तूपरिधि बन घेरे तुझे, वे उँगलियाँ अवदात!
झर गये ख्रद्योत सारे,तिमिर-वात्याचक्र में सब पिस गये अनमोल तारे;बुझ गई पवि के हृदय में काँपकर विद्युत-शिखा रे!साथ तेरा चाहती एकाकिनी बरसात!
व्यंग्यमय है क्षितिज-घेरा
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