ग़ज़ल

जाग तुझको दूर जाना

महादेवी वर्मा · सब कलाम देखें
चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना!जाग तुझको दूर जाना!
अचल हिमगिरि के हॄदय में आज चाहे कम्प हो ले!या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले;आज पी आलोक को ड़ोले तिमिर की घोर छायाजाग या विद्युत शिखाओं में निठुर तूफान बोले!पर तुझे है नाश पथ पर चिन्ह अपने छोड़ आना!जाग तुझको दूर जाना!
बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बंधन सजीले?पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले?विश्व का क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,क्या डुबो देंगे तुझे यह फूल दे दल ओस गीले?तू न अपनी छाँह को अपने लिये कारा बनाना!जाग तुझको दूर जाना!
वज्र का उर एक छोटे अश्रु कण में धो गलाया,दे किसे जीवन-सुधा दो घँट मदिरा माँग लाया!सो गई आँधी मलय की बात का उपधान ले क्या?विश्व का अभिशाप क्या अब नींद बनकर पास आया?
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