ग़ज़ल
अलि! मैं कण-कण को जान चली
अलि, मैं कण-कण को जान चलीसबका क्रन्दन पहचान चली
जो दृग में हीरक-जल भरतेजो चितवन इन्द्रधनुष करतेटूटे सपनों के मनको सेजो सुखे अधरों पर झरते,
जिस मुक्ताहल में मेघ भरेजो तारो के तृण में उतरे,मै नभ के रज के रस-विष केआँसू के सब रँग जान चली।
जिसका मीठा-तीखा दंशन,अंगों मे भरता सुख-सिहरन,जो पग में चुभकर, कर देताजर्जर मानस, चिर आहत मन;
जो मृदु फूलो के स्पन्दन सेजो पैना एकाकीपन से,मै उपवन निर्जन पथ के हरकंटक का मृदु मत जान चली।
गति का दे चिर वरदान चली।जो जल में विद्युत-प्यास भराजो आतप मे जल-जल निखरा,जो झरते फूलो पर देतानिज चन्दन-सी ममता बिखरा;
जो आँसू में धुल-धुल उजला;जो निष्ठुर चरणों का कुचला,मैं मरु उर्वर में कसक भरेअणु-अणु का कम्पन जान चली,प्रति पग को कर लयवान चली।
नभ मेरा सपना स्वर्ण रजतजग संगी अपना चिर विस्मितयह शुल-फूल कर चिर नूतनपथ, मेरी साधों से निर्मित,
इन आँखों के रस से गीलीरज भी है दिल से गर्वीलीमै सुख से चंचल दुख-बोझिलक्षण-क्षण का जीवन जान चली!मिटने को कर निर्माण चली!
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