ग़ज़ल
जब यह दीप थके
जब यह दीप थके तब आना।
यह चंचल सपने भोले है,दृग-जल पर पाले मैने, मृदुपलकों पर तोले हैं;दे सौरभ के पंख इन्हें सब नयनों में पहुँचाना!
साधें करुणा-अंक ढली है,सान्ध्य गगन-सी रंगमयी परपावस की सजला बदली है;विद्युत के दे चरण इन्हें उर-उर की राह बताना!
यह उड़ते क्षण पुलक-भरे है,सुधि से सुरभित स्नेह-धुले,ज्वाला के चुम्बन से निखरे है;दे तारो के प्राण इन्ही से सूने श्वास बसाना!
यह स्पन्दन है अंक-व्यथा केचिर उज्ज्वल अक्षर जीवन कीबिखरी विस्मृत क्षार-कथा के;कण का चल इतिहास इन्हीं से लिख-लिख अजर बनाना!
लौ ने वर्ती को जाना हैवर्ती ने यह स्नेह, स्नेह नेरज का अंचल पहचाना है;चिर बन्धन में बाँध इन्हें धुलने का वर दे जाना!
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