ग़ज़ल
तेरा बीमार न सँभला जो सँभाला लेकर
तेरा बीमार न सँभला जो सँभाला लेकरचुपके ही बैठे रहे दम को मसीहा लेकर
शर्ते-हिम्मत नहीं मुज़रिम हो गिरफ्तारे-अज़ाबतूने क्या छोड़ा अगर छोड़ेगा बदला लेकर
मुझसा मुश्ताक़े-जमाल एक न पाओगे कहींगर्चे ढूँढ़ोगे चिराग़े-रुखे-ज़ेबा लेकर
तेरे क़दमों में ही रह जायेंगे, जायेंगे कहाँदश्त में मेरे क़दम आबलाए-पा लेकर
वाँ से याँ आये थे ऐ 'ज़ौक़' तो क्या लाये थेयाँ से तो जायेंगे हम लाख तमन्ना लेकर
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