ग़ज़ल

क्या आए तुम जो आए घड़ी दो घड़ी

इब्राहीम ज़ौक़ · सब कलाम देखें
क्या आए तुम जो आए घड़ी दो घड़ी के बादसीने में होगी साँस अड़ी दो घड़ी के बाद
क्या रोका अपने गिर्ये को हम ने के लग गईफिर वो ही आँसुओं की झड़ी दो घड़ी के बाद
कोई घड़ी अगर वो मुलाएम हुए तो क्याकह बैठेंगे फिर एक कड़ी दो घड़ी के बाद
उस लाल-ए-लब के हम ने लिए बोसे इस क़दरसब उड़ गई मिसी की धड़ी दो घड़ी के बाद
अल्लाह रे ज़ोफ़-ए-सीना से हर आह-ए-बे-असरलब तक जो पहुँची भी तो चढ़ी दो घड़ी के बाद
कल उस से हम ने तर्क-ए-मुलाक़ात की तो क्याफिर उस बग़ैर कल न पड़ी दो घड़ी के बाद
थे दो घड़ी से शैख़ जी शैख़ी बघारतेसारी वो शैख़ी उन की झड़ी दो घड़ी के बाद
कहता रहा कुछ उस से अदू दो घड़ी तलकग़म्माज़ ने फिर और जड़ी दो घड़ी के बाद
परवाना गिर्द शम्मा के शब दो घड़ी रहाफिर देखी उस की ख़ाक पड़ी दो घड़ी के बाद
तू दो घड़ी का वादा न कर देख जल्द आआने में होगी देर बड़ी दो घड़ी के बाद
गो दो घड़ी तक उस ने न देखा इधर तो क्याआख़िर हमीं से आँख लड़ी दो घड़ी के बाद
क्या जाने दो घड़ी वो रहे 'ज़ौक़' किस तरहफिर तो न ठहरे पाँव घड़ी दो घड़ी के बाद
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