ग़ज़ल
तेरे कूचे को वोह बीमारे-ग़म दारुश्शफ़ा समझे
तेरे कूचे को वोह बीमारे-ग़म दारुलशफा समझेअज़ल को जो तबीब और मर्ग को अपनी दवा समझे
सितम को हम करम समझे जफ़ा को हम वफ़ा समझेऔर इस पर भी न समझे वोह तो उस बुत से ख़ुदा समझे
समझ ही में नहीं आती है कोई बात ‘ज़ौक़’ उसकीकोई जाने तो क्या जाने,कोई समझे तो क्या समझे
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