ग़ज़ल
गोहर को जौहरी सर्राफ़ ज़र को देखते हैं
गोहर को जौहरी सर्राफ़ ज़र को देखते हैंबशर के हैं जो मुबस्सिर बशर को देखते हैं
न ख़ूब ओ ज़िश्त न ऐब ओ हुनर को देखते हैंये चीज़ क्या है बशर हम बशर को देखते हैं
वो देखें बज़्म में पहले किधर को देखते हैंमोहब्बत आज तेरे हम असर को देखते हैं
वो अपनी बुर्रिश-ए-तेग़-ए-नज़र को देखते हैंहम उन को देखते हैं और जिगर को देखते हैं
जब अपने गिर्या ओ सोज़-ए-जिगर को देखते हैंसुलगती आग में हम ख़ुश्क ओ तर को देखते हैं
रफ़ीक़ जब मेरे ज़ख्म-ए-जिगर को देखते हैंतो चारा-गर उन्हें वो चारा-गर को देखते हैं
न तुमतराक़ को ने कर्र-ओ-फ़र्र को देखते हैंहम आदमी के सिफ़ात ओ सियर को देखते हैं
जो रात ख़्वाब में उस फ़ितना-गर को देखते हैंन पूछ हम जो क़यामत सहर को देखते हैं
वो रोज़ हम को गुज़रता है जैसे ईद का दिनकभी जो शक्ल तुम्हारी सहर को देखते हैं
जहाँ के आईनों से दिल का आईना है जुदाइस आईने में हम आईना-गर को देखते हैं
बना के आईना देखे है पहले आईना-गरहुनर-वर अपने ही ऐब ओ हुनर को देखते हैं
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