ग़ज़ल
इस तपिश का है मज़ा दिल ही को हासिल होता
इस तपिश का है मज़ा दिल ही को हासिल होताकाश, मैं इश्क़ में सर-ता-ब-क़दम दिल होता
करता बीमारे-मुहब्बत का मसीहा जो इलाजइतना दिक़ होता कि जीना उसे मुश्किल होता
आप आईना-ए-हस्ती में है तू अपना हरीफ़वर्ना यहाँ कौन था जो तेरे मुक़ाबिल होता
होती अगर उक़्दा-कुशाई न यद-अल्लाह के साथ'ज़ौक़' हाल क्योंकि मेरा उक़्दए-मुश्किल होता
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