ग़ज़ल
इक सदमा दर्द-ए-दिल से मेरी जान
इक सदमा दर्द-ए-दिल से मेरी जान पर तो हैलेकिन बला से यार के ज़ानू पे सर तो है
आना है उन का आना क़यामत का देखियेकब आएँ लेकिन आने की उन के ख़बर तो है
है सर शहीद-ए-इश्क़ का ज़ेब-ए-सिनान-ए-यारसद शुक्र बारे नख़्ल-ए-वफ़ा बार-वर तो है
मानिंद-ए-शम्मा गिर्या है क्या शुग़ल-ए-तुरफ़ा-तरहो जाती रात उस में बला से बसर तो है
है दर्द दिल में गर नहीं हम-दर्द मेरे पासदिल-सोज़ कोई गर नहीं सोज़-ए-जिगर तो है
ऐ दिल हुजूम-ए-दर्द-ओ-अलम से न तंग होख़ाना-ख़राब ख़ुश हो के आबाद घर तो है
तुर्बत पे दिल-जलों की नहीं गर चराग़ ओ गुलसीने में सोज़िश-ए-दिल ओ दाग़-ए-जिगर तो है
ग़ायब में जो कहा सो कहा फिर भी है ये शुक्रख़ामोश हो गया वो मुझे देख कर तो है
कश्ती-ए-बहर-ए-ग़म है मेरे हक़ में तेग़-ए-यारकर देती एक दम में इधर से उधर तो है
वो दिल के जिस में सोज़-ए-मोहब्बत न होवे 'ज़ौक़'बेहतर है संग उस से के उस में शरर तो है
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