ग़ज़ल
आँखें मेरी तलवों से वो मिल जाए
आँखें मेरी तलवों से वो मिल जाए तो अच्छाहै हसरत-ए-पा-बोस निकल जाए तो अच्छा.
जो चश्म के बे-नम हो वो हो कोर तो बेहतरजो दिल के हो बे-दाग़ वो जल जाए तो अच्छा.
बीमार-ए-मोहब्बत ने लिया तेरे सँभालालेकिन वो सँभाले से सँभल जाए तो अच्छा.
हो तुझ से अयादत जो न बीमार की अपनेलेने को ख़बर उस की अजल जाए तो अच्छा.
खींचे दिल-ए-इंसाँ को न वो ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ामअज़दर कोई गर उस को निगल जाए तो अच्छा.
तासीर-ए-मोहब्बत अजब इक हब का अमल हैलेकिन ये अमल यार पे चल जाए तो अच्छा.
दिल गिर के नज़र से तेरी उठने का नहीं फिरये गिरने से पहले ही संभल जाए तो अच्छा.
फ़ुर्क़त में तेरी तार-ए-नफ़स सीने में मेरेकाँटा सा खटकता है निकल जाए तो अच्छा.
ऐ गिर्या न रख मेरे तन-ए-ख़ुश्क को ग़र्क़ाबलकड़ी की तरह पानी में गल जाए तो अच्छा.
हाँ कुछ तो हो हासिल समर-ए-नख़्ल-ए-मोहब्बतये सीना फफूलों से जो फल जाए तो अच्छा.
वो सुब्ह को आए तो करूँ बातों में दो-पहरऔर चाहूँ के दिन थोड़ा सा ढल जाए तो अच्छा.
ढल जाए जो दिन भी तो उसी तरह करूँ शामऔर चाहूँ के गर आज से कल जाए तो अच्छा.
जब कल हो तो फिर वो ही कहूँ कल की तरह सेगर आज का दिन भी यूँ ही टल जाए तो अच्छा.
अल-क़िस्सा नहीं चाहता मैं जाए वो याँ सेदिल उस का यहीं गरचे बहल जाए तो अच्छा.
है क़ता रह-ए-इश्क़ में ऐ 'ज़ौक़' अदब शर्तजूँ शम्मा तू अब सर ही के बल जाए तो अच्छा.
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