ग़ज़ल

अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जायेंगे

इब्राहीम ज़ौक़ · सब कलाम देखें
अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जायेंगेमर गये पर न लगा जी तो किधर जायेंगे
सामने-चश्मे-गुहरबार के, कह दो, दरियाचढ़ के अगर आये तो नज़रों से उतर जायेंगे
ख़ाली ऐ चारागरों होंगे बहुत मरहमदानपर मेरे ज़ख्म नहीं ऐसे कि भर जायेंगे
पहुँचेंगे रहगुज़र-ए-यार तलक हम क्योंकरपहले जब तक न दो-आलम से गुज़र जायेंगे
आग दोजख़ की भी हो आयेगी पानी-पानीजब ये आसी अरक़-ए-शर्म से तर जायेंगे
हम नहीं वह जो करें ख़ून का दावा तुझपरबल्कि पूछेगा ख़ुदा भी तो मुकर जायेंगे
रुख़े-रौशन से नक़ाब अपने उलट देखो तुममेहरो-मह नज़रों से यारों के उतर जायेंगे
'ज़ौक़' जो मदरसे के बिगड़े हुए हैं मुल्लाउनको मैख़ाने में ले लाओ, सँवर जायेंगे
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