ग़ज़ल

तेरे आफ़त-ज़दा जिन दश्तों में

इब्राहीम ज़ौक़ · सब कलाम देखें
तेरे आफ़त-ज़दा जिन दश्तों में अड़ जाते हैंसब्र ओ ताक़त के वहाँ पाँव उखड़ जाते हैं
इतने बिगड़े हैं वो मुझ से के अगर नाम उन केख़त भी लिखता हूँ तो सब हर्फ़ बिगड़ जाते हैं
क्यूँ न लड़वाएँ उन्हें ग़ैर के करते हैं यहीहम-नशीं जिन के नसीबे कहीं लड़ जाते हैं
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