ग़ज़ल
ऐ 'ज़ौक़' वक़्त नाले के रख ले जिगर पे हाथ
ऐ 'ज़ौक़' वक़्त नाले के रख ले जिगर पे हाथवर्ना जिगर को रोएगा तू धर के सर पे हाथ
छोड़ा न दिल में सब्र न आराम ने क़रारतेरी निगह ने साफ़ किया घर के घर पे हाथ
खाए है इस मज़े से ग़म-ए-इश्क़ मेरा दिलजैसे गुरिसना मारे है हलवा-ए-तर पे हाथ
ख़त दे के चाहता था ज़बानी भी कुछ कहेरक्खा मगर किसी ने दिल-ए-नामा-बर पे हाथ
जूँ पंच-शाख़ा तू न जला उंगलियाँ तबीबरख रख के नब्ज़-ए-आशिक़-ए-तफ़्ता-जिगर पे हाथ
क़ातिल ये क्या सितम है के उठता नहीं कभीआ कर मज़ार-ए-कुश्ता-ए-तेग़-ए-नज़र पे हाथ
मैं ना-तवाँ हूँ ख़ाक का परवाने की ग़ुबारउठता हूँ रख के दोश-ए-नसीम-ए-सहर पे हाथ
ऐ शम्मा एक चोर है बादी ये बाद-ए-सुबहमारे है कोई दम में तेरे ताज-ए-ज़र पे हाथ
ऐ ‘ज़ौक़’ मैं तो बैठ गया दिल को थाम करइस नाज़ से खड़े थे वो रख कर कमर पे हाथ
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