ग़ज़ल

अज़ीज़ो इस को न घड़ियाल की

इब्राहीम ज़ौक़ · सब कलाम देखें
अज़ीज़ो इस को न घड़ियाल की सदा समझोये उम्र-ए-रफ़्ता की अपनी सदा-ए-पा समझो
बजा कहे जिसे आलम उसे बजा समझोज़बान-ए-ख़ल्क़ को नक़्क़ारा-ए-ख़ुदा समझो
न समझो दश्त शिफ़ा-ख़ाना-ए-जुनूँ है येजो ख़ाकसी भी पड़े फाँकनी दवा समझो
समझ तू कोर-सवादों को हो जो इल्म न होगर समझ भी न हो कोर-ए-बे-असा समझो
पड़े किताब के क़िस्सों में क्या करो दिल साफ़सफ़ा हो दिल तो ब-अज़ रौज़तुस-सफ़ा समझो
हँसे जो वो मेरे रोने पे तो सफ़-ए-मिज़गाँन समझो तुम उसे दीवार-ए-क़हक़हा समझो
नफ़स की आमद ओ शुद है नमाज़-ए-अहल-ए-हयातजो ये क़ज़ा हो तो ऐ ग़ाफ़िलो क़ज़ा समझो
तुम्हारी राह में मिलते हैं ख़ाक में लाखोंइस आरजू में के तुम अपना ख़ाक-ए-पा समझो
दुआएँ देते हैं हम दिल से तेग़-ए-क़ातिल कोलब-ए-जराहत-ए-दिल को लब-ए-दुआ समझो
बहा दिया मेरा ख़ूँ उस ने अपने कूचे मेंउसी को यारो दियत समझो ख़ूँ-बहा समझो
समझ है और तुम्हारी कहूँ मैं तुम से क्यातुम अपने दिल में ख़ुदा जाने सुन के क्या समझो
तुम्हें है नाम से क्या काम मिस्ल-ए-आईनाजो रू-ब-रू हो उसे सूरत-आशना समझो
ज़हे नसीब के हंगाम-ए-मश्क़ तीर-ए-सितमहमारे ढेर को तुम तो वो ख़ाक का समझो
नहीं है कम ज़र-ए-ख़ालिस से ज़र्दी-ए-रुख़सारतुम अपने इश्क़ को ऐ 'ज़ौक़' कीमिया समझो
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