ग़ज़ल
कब हक़-परस्त ज़ाहिद-ए-जन्नत-परस्त है
कब हक़-परस्त ज़ाहिद-ए-जन्नत-परस्त हैहूरों पे मर रहा है ये शहवत-परस्त है
दिल साफ़ हो तो चाहिए मानी-परस्त होआईना ख़ाक साफ़ है सूरत-परस्त है
दरवेश है वही जो रियाज़त में चुस्त होतारिक नहीं फ़क़ीर भी राहत-परस्त है
जुज़ ज़ुल्फ़ सूझता नहीं ऐ मुर्ग़-ए-दिल तुझेख़ुफ़्फ़ाश तू नहीं है के ज़ुल्मत-परस्त है
दौलत की रख न मार-ए-सर-ए-गंज से उम्मीदमूज़ी वो देगा क्या के जो दौलत-परस्त है
अन्क़ा ने गुम किया है निशाँ नाम के लिएगुम-गश्ता कौन कहता है शोहरत-परस्त है
ये 'ज़ौक़' मै-परस्त है या है सनम-परस्तकुछ है बला से लेक मोहब्बत-परस्त है
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