ग़ज़ल
जान के जी में सदा जीने का ही अरमाँ रहा
जान के जी में सदा जीने का ही अरमाँ रहादिल को भी देखा किये यह भी परेशाँ ही रहा
कब लिबासे-दुनयवी में छूपते हैं रौशन-ज़मीरख़ानाए-फ़ानूस में भी शोला उरियाँ ही रहा
आदमीयत और शै है, इल्म है कुछ और शैकितना तोते को पढ़ाया पर वो हैवाँ ही रहा
मुद्दतों दिल और पैकाँ दोनों सीने में रहेआख़िरश दिल बह गया ख़ूँ होके, पैकाँ ही रहा
दीनो-ईमाँ ढूँढ़ता है 'ज़ौक़' क्या इस वक़्त मेंअब न कुछ दीं ही रहा बाक़ी न ईमाँ ही रहा
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