ग़ज़ल

आज उनसे मुद्दई कुछ मुद्दा कहने को है

इब्राहीम ज़ौक़ · सब कलाम देखें
आज उनसे मुद्दई कुछ मुद्दआ कहने को हैयह नहीं मालूम क्या कहवेंगे क्या कहने को है
देखे आईने बहुत, बिन ख़ाक़ हैं नासाफ़ सबहैं कहाँ अहले-सफ़ा, अहले-सफ़ा कहने को हैं
दम-बदम रूक-रुक के है मुँह से निकल पड़ती ज़बाँवस्फ़ उसका कह चुके फ़व्वारे या कहने को है
देख ले तू पहुँचे किस आलम से किस आलम में हैनालाहाए-दिल हमारे नारसा कहने को है
बेसबब सूफ़ार उनके मुँह नहीं खोंलें है 'ज़ौक़'आये पैके-मर्ग पैग़ामे-क़ज़ा कहने को है
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