ग़ज़ल
आज उनसे मुद्दई कुछ मुद्दा कहने को है
आज उनसे मुद्दई कुछ मुद्दआ कहने को हैयह नहीं मालूम क्या कहवेंगे क्या कहने को है
देखे आईने बहुत, बिन ख़ाक़ हैं नासाफ़ सबहैं कहाँ अहले-सफ़ा, अहले-सफ़ा कहने को हैं
दम-बदम रूक-रुक के है मुँह से निकल पड़ती ज़बाँवस्फ़ उसका कह चुके फ़व्वारे या कहने को है
देख ले तू पहुँचे किस आलम से किस आलम में हैनालाहाए-दिल हमारे नारसा कहने को है
बेसबब सूफ़ार उनके मुँह नहीं खोंलें है 'ज़ौक़'आये पैके-मर्ग पैग़ामे-क़ज़ा कहने को है
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh