ग़ज़ल

है मश्क़े-सुख़न जारी चक्की की मशक़्क़त भी

हसरत मोहानी · सब कलाम देखें
है मश्क़े-सुख़नजारी, चक्की की मशक़्क़त भीइक तरफ़ातमाशा है हसरत की तबीयत भी
जो चाहो सज़ा दे लो तुम और भी खुल-खेलोपर हम से क़सम ले लो की हो जो शिकायत भी
ख़ुद इश्क़ की गुस्ताख़ी सब तुझको सिखा देगीअय हुस्न-ए-हया परवर शोख़ी भी शरारत भी
उश्शाक़ के दिल नाज़ुक, उस शोख़ की ख़ू नाज़ुकनाज़ुक इसी निस्बत से है कारे-महब्बत भी
अय शौक़ की बेबाकी वोह क्या तेरी ख़्वाहिश थीजिसपर उन्हें ग़ुस्सा है, इनकार भी ,हैरत भी
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