ग़ज़ल

देखना भी तो उन्हें दूर से देखा करना

हसरत मोहानी · सब कलाम देखें
देखना भी तो उन्हें दूर से देखा करनाशेवा-ए-इश्क़ नहीं हुस्न को रुसवा करना
इक नज़र ही तेरी काफ़ी थी कि आई राहत-ए-जानकुछ भी दुश्वार न था मुझ को शकेबा करना
उन को यहाँ वादे पे आ लेने दे ऐ अब्र-ए-बहारजिस तरह चाहना फिर बाद में बरसा करना
शाम हो या कि सहर याद उन्हीं की रख लेदिन हो या रात हमें ज़िक्र उन्हीं का करना
कुछ समझ में नहीं आता कि ये क्या है 'हसरत'उन से मिलकर भी न इज़हार-ए-तमन्ना करना
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