ग़ज़ल

ख़ू समझ में नहीं आती तेरे दीवानों की

हसरत मोहानी · सब कलाम देखें
ख़ू समझ में नहीं आती तेरे दीवानों कीजिनको दामन की ख़बर है न गिरेबानों की
आँख वाले तेरी सूरत पे मिटे जाते हैंशम‍अ़-महफ़िल की तरफ़ भीड़ है परवानों की
राज़े-ग़म से हमें आगाह किया ख़ूब कियाकुछ निहायत ही नहीं आपके अहसानों की
आशिक़ों ही का जिगर है कि हैं ख़ुरसंदे-ज़फ़ाकाफ़िरों की है ये हिम्मत न मुसलमानों की
याद फिर ताज़ा हुई हाल से तेरे 'हसरत'क़ैसो-फ़रहाद के भूले हुए अफ़सानों की
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