ग़ज़ल
मस्ती के फिर आ गये ज़माने
मस्ती के फिर आ गये ज़मानेआबाद हुए शराबख़ाने
हर फूल चमन में ज़र-ब-कफ़ हैबाँटे हैं बहार ने ख़ज़ाने
सब हँस पड़े खिलखिला के ग़ुंचेछेड़ा जो लतीफ़ा सबा ने
सरसब्ज़ हुआ निहाले-ग़म भीपैदा वो असर किया हवा ने
रिन्दों ने पिछाड़कर पिला दीवाइज़ के न चल सके बहाने
कर दूँगा मैं हर वली को मयख़्वारतौफ़ीक़ जो दी मुझे ख़ुदा ने
हमने तो निसार कर दिया दिलअब जाने वो शोख़, या न जाने
बेग़ाना-ए-मय किया है मुझकोसाक़ी की निगाहे -आश्ना ने
मसकन है क़फ़स में बुलबुलों कावीराँ पड़े हैं आशियाने
अब काहे को आएँगे वो ‘हसरत’आग़ाज़े-जुनूँ के फिर ज़माने
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